मध्यप्रदेश के नागदा में ग्रेसिम केमिकल डिवीजन यूनिट की भूमि को लेकर जांच के आदेश, राजस्व चोरी के आरोप की जांच में उलझा प्रबंधन
उज्जैन जिले के नागदा में बंद भारत कॉमर्स उद्योग की करोड़ों की भूमि के स्वामित्व को लेकर ग्रेसिम कंपनी प्रबंधन एवं मप्र शासन के बीच सुप्रीम कोर्ट में जारी विवाद का अभी निराकरण हुआ भी नहीं थाकि, इसी कंपनी की एक और नागदा में स्थापित यूनिट ग्रेसिम केमिकल डिवीजन की भूमि भी जांच के घेरे में आ गई है। यह यूनिट जिस भूमि पर संचालित है वह आज भी कृषि भूमि है। जिसका औद्योगिक डायवर्शन नही है। इस प्रकार की एक शिकायत पर प्रशासन ने जांच के आदेश दिए है। शिकायत में बड़ा मुद्दा यह हैकि इस कारण शासन को लाखों की राजस्व चोरी का चूना लगा है।
जांच आदेश अनुविभागीय अधिकारी राजस्व ने दिया है। इस मामले की जांच की जिम्मेदारी तहसीलदार को सौंपी गई है। इस निर्देश में हिदायत दी गई है कि इस मामले की जांच राजस्व निरीक्षक एवं पटवारियों का एक दल गठित कर की जाए। इतना ही नहीं जांच के बाद आवश्यक कार्यवाही का प्रतिवेदन भी स्पष्ट अभिमत समेत मांगा गया है। एसडीएम के इस जांच निर्देश हमारे संवाददाता के पास सुरक्षित है। प्रशासन के संज्ञान में यह मामला भारत सरकार रेलवे सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य अभिषेक चौरसिया निवासी नागदा की एक शिकायत के बाद सामने आया है।
अनुविभागीय अधिकारी की पुष्टि
अनुविभागीय अधिकारी राजस्व आशुतोष गोस्वामी ने हमारे संवाददाता नागदा से प्रत्यक्ष बातचीत में स्वीकार किया कि ग्रेसिम केमिकल डिवीजन उद्योग की भूमि का डायवर्शन नहीं होने की शिकायत मिली है। जांच के लिए टीम बनाने का निर्देश तहसीलदार को दिया गया है। जांच प्रतिवेदन अमिमत समेत मांगा गया है। जांच के बाद यदि शिकायत सही पाई गई तो नियमों के तहत कार्यवाही की जाएगी।
शिकायत की प्रति सुरक्षित
मिली जानकारी के अनुसार यह पूरा मामला स्थानीय प्रशासन के समक्ष हाल में पहुंचा है। इस पूरे प्रकरण के मामले में शिकायत कर्ता अभिषेक चौरसिया से संपर्क करने पर उन्होंने प्रशासन के समक्ष पंजीकृत शिकायत की प्रति संवाददाता को उपलब्ध कराई गयी हैं।
जांच मुख्य बिंदु
1 शिकायत प्रति के अनुसार नागदा केमिकल डिवीजन के नाम से एक यूनिट संचालित है। बताया जा रहा हैकि यह यूनिट यहां पर 1972 से चल रही है। इस यूनिट में सबसे अधिक कास्टिक सोड़ा का उत्पादन किया जाता है। अन्य और भी कई उत्पादों का प्रोडक् शन जारी है। इस यूनिट की स्थापना के समय राजस्व ग्राम मेहतवास में कृषि भूमि का निजी क्रय किया गया है। कृषि भूमि आराजी का बिना वैध- डायवर्शन किए व्यावसायिक उद्योग यूनिट को स्थापित करने का आरोप है। शिकायत के मुताबिक इस प्रकार की गतिविधियों से प्रशासन को लाखों की कर चोरी हो रही है। यह कृत्य मप्र भू राजस्व संहिता 1959 के तहत अवैधानिक है तथा अर्थदंड के दायरे में है।
भूमि का सर्वे नंबर प्रशासन के पास पहुंचा
जांच के लिए प्रशासन के समक्ष कुल 40 भूमि के सर्वे नंबर की सूची पहुंची है। इन सर्वे नंबर के आधार पर यह मसला उठाया गया कि आज भी राजस्व दस्तावेजों में ये सर्वे नंबर कृषि भूमि दर्ज है। तथा राजस्व अभिलेखों में यह भी उपलब्ध हैकि इन सर्वे नंबर पर औद्योगिक उपयोग किया जा रहा है। यदि इस भूमि का डायवर्सन होता है तो शासन को लाखों की राजस्व आय होगी। प्रबंधन इस भूमि को कृषि के रूप में उपयोग कर रहा है, ओैर उस पर वाणिज्य व्यापार से कमाई की जा रही है। ऐसी भूमि के सर्वे नंबर का विवरण इस प्रकार से जांच में शामिल है- सर्वे क्रमांक 246/1/1 रकबा 0.4440 हैक्टयर ,सर्व नंबर 246/3/1 रकबा 0.1370 हैक्टयर, 246/3/2- 0.0730 हैक्टयर, 246/4/3-0.8880 हैक्टयर, सर्वे नंबर 249, 250/1, 250/2-कुल 0.6850 हैक्टयर, 260/2- 1.0180, 1/144/1- 4.1810, 100/1 -0.0420,101/3- 0.1710, 261/-0.5230, 264/1, 264/2-0.3340, सर्वे नंबर 265 से लेकर 267 तक कुल रकबा- 2.1730 हैक्टयर, सर्वे नंबर 271 से लेकर 279 तक कुल रकबा – 9.6970 हैक्टयर, 280/1- 0.9930 हैक्टयर, सर्वे नबंर 281 एवं 282 कुल रकबा 1.4630 हैक्टयर, सर्वे नंबर 283/1, 284/1, 285/1/1, 285/2 एवं 286/2, 286/1 कुल रकबा-5.7260 हैक्टयर तथा सर्वे नंबर 287 से लेकर 289 तक एवं सर्वे नंबर 295/1, 303, 304/1, 304/2, 306, 307/1/1 , 366 व 400/1 कुल रकबा- 14. 8670 हैक्टयर भूमि है। इस प्रकार सभी 40 सर्वे क्रमांक की भूमि का कुल आंकलन किया जाए तो लगभग 46 हैक्टेयर भूमि जांच के घेरे में हैं।
यूनिट की भूमि पर इस प्रकार प्रोडक्शन
पुष्ट जानकारी के अनुसार ग्रेसिम केमिकल डिवीजन यूनिट का कुल एरिया प्रबंधन ने भारत सरकार पर्यावरण विभाग नई दिल्ली को प्रस्तुत दस्तावजों में 61.92 हैक्टयर भूमि दर्शाया है। इन दस्तावेजों की प्रति हमारे संवाददाता के पास सुरक्षित है। इधर,जांच के दायरे में आई भूमि पर उद्योग की मशीनों का जाल बिछा है। जिस पर 24 घंटों कारखाने का शोरगुल मचा रहता है। शिकायत के आरोप के मुताबिक जबकि राजस्व रिकॉर्ड में यह भूमि आज भी कृषि मद में हैं। संदर्भित भूमि पर लगभग 12 रसायनों का उत्पाद के पुष्ट प्रमाण हमारे हाथ लगे हैं। इस यूनिट में कास्टिक सोड़ा का उत्पादन 270000 टन प्रतिवर्ष होता आ रहा है। गत वर्ष भारत सरकार पर्यावरण विभाग से इस उत्पादन को बढाने की अनुमति इस यूनिट प्रबंधन को मिल चुकी है। जिसके बाद मात्रा अब 450000 टन प्रतिवर्ष तक करने की इजाजत है। इसके अलावा इस यूनिट में नई प्रोडक् शन की नई अनुमति के बाद उत्पाद इस प्रकार है- क्लोरीन 365000 टन प्रतिवर्ष, हाइड्रोक्लोरिक एसिड 1350000 टन प्रतिवर्ष, सोडियम हाइपोक्लोराईड 90000 टन प्रतिवर्ष, हाइड्रोजन 11400 पोली एल्युमिनियम क्लोराईड- 55000 टन प्रतिवर्ष स्टपेल ब्लीचिंग पावडर- 54750 टन प्रतिवर्ष ,क्लोरो सल्फोनिक एसिड-23400 टन प्रतिवर्ष,, कैलशियम क्लोराईड- 54000 टन प्रतिवर्ष, कार्बन डाई आक्साईड- 23760 टन प्रतिवर्ष एवं क्लोरोमीथेन 36000 टन प्रतिवर्ष है।
उज्जैन संवाददाता शम्भू राठौड़ की रिपोर्ट